भारतीय शहरों को अपने जल भविष्य पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता

पाठ्यक्रम : जीएस-2/शासन; जीएस-3/जल संरक्षण 

सन्दर्भ

  • देश के कई भागों में भीषण जल संकट तथा भूजल संकट और जलाशयों के घटते स्तर के कारण लू की स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है।

भारत में जल संकट

  • भारत के पास विश्व की 18% जनसंख्या है, लेकिन इसके पास विश्व के केवल 4% मीठे जल संसाधन हैं।
  • विश्व बैंक भारत को जल-संकट से सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक मानता है।
  • बढ़ती मांग, खराब प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक भारत के अनेक क्षेत्रों में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • भारत के प्रमुख जलाशयों में जल स्तर उनकी कुल भंडारण क्षमता के 45% से भी नीचे पहुँच गया है।
  • कई जलाशय अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गए हैं या पूरी तरह सूख चुके हैं।
  • भारत के 20 नदी बेसिनों में से अधिकांश वर्तमान में अपनी क्षमता के 30% से 60% के बीच संचालित हो रहे हैं, जबकि केवल कुछ ही इस सीमा से ऊपर हैं। बिहार में चंदन बाँध पूरी तरह सूख चुका है।

जल संकट के प्रमुख कारण

  • तीव्र शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जल निकायों का प्रदूषण बढ़ा है, जिससे वे उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो गए हैं।
  • अकुशल कृषि पद्धतियों तथा भूजल के अत्यधिक दोहन ने महत्वपूर्ण जल स्रोतों को क्षीण कर दिया है।
  • जलवायु परिवर्तन इस स्थिति को और गंभीर बनाता है, जिससे वर्षा के अनियमित प्रतिरूप उत्पन्न होते हैं तथा नदियों और भूजलभृतों (एक्वीफर) के पुनर्भरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • कमजोर जल प्रबंधन तथा उपयुक्त अवसंरचना की कमी भी इस संकट को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत में जल संकट का प्रभाव

  • कृषि के लिए खतरा: सिंचाई जल की उपलब्धता में कमी से फसल उत्पादकता घटती है और फसल विफलता का जोखिम बढ़ता है।
  • जनस्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता की कमी से जलजनित रोगों का प्रसार बढ़ जाता है।
  • पर्यावरणीय क्षरण: भूजल के अत्यधिक दोहन तथा नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों के सूखने से पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को नुकसान पहुँचता है।
  • सामाजिक संघर्ष और प्रवासन: सीमित जल संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा विवादों को जन्म दे सकती है तथा लोगों को सूखा-प्रभावित क्षेत्रों से पलायन के लिए विवश कर सकती है।

संवैधानिक प्रावधान

  • राज्य सूची का विषय: जल मुख्यतः राज्य सूची (सातवीं अनुसूची) की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत आता है।
  • संघ की भूमिका: अंतर्राज्यीय नदियों का विनियमन संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अंतर्गत किया जाता है।
  • अनुच्छेद 262: संसद को अंतर्राज्यीय जल विवादों के निपटारे का अधिकार प्रदान करता है।

भारत में जल शासन से संबंधित प्रमुख समस्याएँ

  • विखंडित संस्थागत ढाँचा: राज्य सूची में होने के कारण भारत में जल शासन अत्यधिक विखंडित है, जिससे राज्यों के बीच अधिकार-क्षेत्र संबंधी विवाद उत्पन्न होते हैं।
  • अभियांत्रिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की प्रधानता: भारत की जल प्रबंधन नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से बाँधों, नहरों और सिंचाई प्रणालियों जैसी बड़े पैमाने की अवसंरचनाओं पर केंद्रित रही हैं। यह दृष्टिकोण आपूर्ति वृद्धि को प्राथमिकता देता है, जबकि पारिस्थितिकीय स्थिरता और मांग प्रबंधन की उपेक्षा करता है।
  • कृषि नीतियाँ: धान और गेहूँ जैसी अधिक जल-आधारित फसलों को प्रोत्साहित करने वाली कृषि नीतियों ने भूजल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा दिया है।
  • पारिस्थितिकी तंत्र आधारित दृष्टिकोण का अभाव: जल शासन में भूमि, जल और पारिस्थितिकी तंत्र के बीच अंतर्संबंधों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया जाता।
  • पर्यावरणीय प्रवाह (E-flow) की अक्सर उपेक्षा की जाती है, जिससे नदियों और आर्द्रभूमियों का क्षरण होता है।
  • कमजोर आँकड़ा प्रणाली: देशभर में विश्वसनीय, व्यापक और सुलभ जल आँकड़ों का अभाव है।
  • इससे कमजोर योजना निर्माण, संसाधनों का अकुशल आवंटन तथा जल संसाधनों का अनियंत्रित दोहन होता है।
  • मांग-पक्ष प्रबंधन की उपेक्षा: जल नीतियाँ मुख्यतः आपूर्ति बढ़ाने पर केंद्रित हैं, जबकि मांग प्रबंधन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। जल उपयोग दक्षता, संरक्षण उपायों तथा तर्कसंगत मूल्य निर्धारण को सीमित महत्व दिया जाता है।

सरकारी पहलें

  • जल शक्ति अभियान (2019): जल-संकटग्रस्त जिलों में जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर केंद्रित।
  • अमृत 2.0 योजना: वर्ष 2021 में सभी शहरी स्थानीय निकायों (ULB) और शहरों में शुरू की गई, ताकि शहरों को “आत्मनिर्भर” और “जल सुरक्षित” बनाया जा सके।
  • जल निकायों का पुनर्जीवन तथा हरित क्षेत्रों और पार्कों का विकास भी इस मिशन के प्रमुख घटक हैं।
  • अमृत सरोवर मिशन: प्रत्येक जिले में 75 जल निकायों के विकास और पुनर्जीवन का लक्ष्य रखता है।
  • राष्ट्रीय भूजलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM): भूजलभृतों की पहचान और समझ विकसित कर उनके सतत प्रबंधन में सहायता करता है।
  • भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण हेतु मास्टर प्लान (2020): केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा तैयार इस योजना में 185 बीसीएम वर्षाजल के संचयन हेतु 1.42 करोड़ वर्षाजल संचयन और पुनर्भरण संरचनाओं की परिकल्पना की गई है।
  • अटल भूजल योजना: गंभीर और अति-दोहन वाले क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन में सुधार के उद्देश्य से शुरू की गई।
  • जल जीवन मिशन (JJM): देश के प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सुनिश्चित पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2019 से केंद्र और राज्यों की साझेदारी में लागू किया जा रहा है। यह पहल नल जल कनेक्शन के माध्यम से निर्धारित गुणवत्ता का पर्याप्त जल नियमित और दीर्घकालिक आधार पर उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
  • राष्ट्रीय जल पुरस्कार: जल संसाधन विभाग द्वारा वर्ष 2018 में शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य जल संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान को पहचानना और प्रोत्साहित करना है। इन पुरस्कारों का उद्देश्य जल के महत्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना तथा जल उपयोग की सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

आगे की राह

  • सार्वजनिक आपातकालीन जल योजना: एक बुनियादी योजना के अंतर्गत सबसे संवेदनशील वार्डों और महत्वपूर्ण संस्थानों की पहचान की जाए, जल की कमी की स्थिति में प्राथमिकता निर्धारण के स्पष्ट नियम बनाए जाएँ तथा भंडारण स्तर और अपेक्षित आपूर्ति के संबंध में नियमित सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
  • जल पुनर्प्राप्ति: दूरस्थ और महंगे नए जल स्रोतों की घोषणा करने के बजाय शहरों को सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में समयबद्ध “रिसाव खोज अभियान” शुरू करना चाहिए, दृश्यमान रिसावों को शीघ्रता से ठीक करना चाहिए तथा जल हानि को कम करने के लिए अल्पकालिक लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए।
  • सतत उपयोग: सरकारी भवन, बड़े परिसर और वाणिज्यिक संस्थान जल के सबसे स्थिर उपभोक्ताओं में शामिल हैं। आंतरिक लेखा-परीक्षण, रिसावों की मरम्मत तथा सरल दक्षता उपायों के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में जल की बचत की जा सकती है।
  • उपयोग किए गए जल का प्रबंधन: जल पाइपलाइनों में रिसाव कम करने के लिए अपनाए जाने वाले उपायों का उपयोग सीवर नेटवर्क में भी किया जाना चाहिए, ताकि बड़े पैमाने पर सीवेज रिसाव को रोका जा सके और प्रदूषण को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

  • विखंडित तथा अभियांत्रिकी(engineering)

-प्रधान दृष्टिकोण से आगे बढ़कर एक समग्र जल शासन ढाँचे को अपनाने की आवश्यकता है।

  • जल को एक साझा और सीमित संसाधन के रूप में देखते हुए विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वित प्रबंधन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • ध्यान केवल जल आपूर्ति बढ़ाने पर नहीं, बल्कि स्थिरता, दक्षता और समानता पर केंद्रित होना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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